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पांच दिन अवैध हिरासत में रखने पर हाईकोर्ट सख्त, देवरिया के युवक को मिलेगा 1.25 लाख रुपये मुआवजा

विजय शंकर यादव उप संपादक

 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देवरिया के चंदन राजभर को 5 दिन अवैध हिरासत में रखने पर राज्य सरकार को ₹1.25 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया।

 

 

प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देवरिया पुलिस द्वारा एक युवक को पांच दिनों तक अवैध हिरासत में रखे जाने के गंभीर मामले में कड़ा रुख अपनाया है। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह पीड़ित चंदन राजभर को ₹1.25 लाख का मुआवजा अदा करे। अदालत ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की कि मामले के जांच अधिकारी ने तय कानूनी प्रक्रियाओं का खुला उल्लंघन किया और अपने पद व अधिकारों का घोर दुरुपयोग किया। कोर्ट ने यह भी व्यवस्था दी कि मुआवजा राशि प्राप्त होने के बाद भी पीड़ित चंदन राजभर दोषी पुलिसकर्मियों व विभाग के खिलाफ दीवानी मुकदमा दायर करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर खंडपीठ का निर्णय –

​यह फैसला न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने ज्ञांती देवी और दो अन्य की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया। याचिका में युवक की रिहाई और अवैध हिरासत के विरुद्ध न्याय की गुहार लगाई गई थी। अदालत ने अवैध निरुद्धि की गंभीरता को देखते हुए प्रति दिन 25 हजार रुपये के हिसाब से पांच दिनों के लिए कुल ₹1.25 लाख का आर्थिक मुआवजा तय किया।

​प्रेम विवाह और पुणे से हिरासत का मामला –

​मामले के अनुसार, देवरिया जनपद के सलेमपुर थाने में 18 जुलाई 2026 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 87 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। एक महिला ने आरोप लगाया था कि चंदन राजभर उसकी 18 वर्षीय पुत्री को बहला-फुसलाकर ले गया है। उधर, याचिकाकर्ताओं का पक्ष था कि दोनों बालिग हैं और उन्होंने बिहार के सिवान स्थित दुर्गा मंदिर में शादी की थी, जिसके बाद वे पुणे में पति-पत्नी की तरह रह रहे थे। 24 अगस्त की रात युवती के पिता पुलिसकर्मियों के साथ पुणे पहुंचे और दोनों को पकड़कर सलेमपुर ले आए। आरोप है कि चंदन को 28 अगस्त से 2 सितंबर तक थाने में अवैध रूप से रखा गया और उसकी विधिवत गिरफ्तारी के दस्तावेज 2 सितंबर को तैयार किए गए

दोषी जांच अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई –

​सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अधिवक्ता ने अदालत को अवगत कराया कि क्षेत्राधिकारी की 21 अक्टूबर की जांच आख्या में जांच अधिकारी उपनिरीक्षक दीप नारायण यादव को प्रथम दृष्टया दोषी पाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने दुर्भावनापूर्वक युवक को अवैध हिरासत में रखा था। इसके आधार पर पुलिस अधीक्षक देवरिया ने संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि जांच पूरी होने पर दोषी अधिकारी के खिलाफ कठोर दंडात्मक कदम उठाए जाएं।

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